संक्षेप में
NIPT आपके खून में मौजूद प्लेसेंटा के DNA को पढ़कर डाउन, एडवर्ड्स और पटाऊ सिंड्रोम की स्क्रीनिंग करता है। यहां जानिए लो-चांस और हाई-चांस नतीजों का मतलब क्या है, हाई-चांस नतीजे के बाद कोई भी फैसला लेने से पहले CVS या एम्नियोसेंटेसिस क्यों जरूरी है, 'कोई नतीजा नहीं' वाली रिपोर्ट का मतलब क्या है, और यह कभी भी लिंग जानने का टेस्ट क्यों नहीं है।
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NIPT आपके खून में क्या पढ़ता है
NIPT, यानी नॉन-इनवेसिव प्रीनेटल टेस्टिंग (non-invasive prenatal testing), जिसे सेल-फ्री DNA स्क्रीनिंग (cell-free DNA screening) भी कहते हैं, मां के खून से किया जाने वाला टेस्ट है। प्रेग्नेंसी के दौरान प्लेसेंटा से निकले DNA के छोटे-छोटे टुकड़े मां के खून में उसके अपने DNA के साथ घूमते रहते हैं। सोसाइटी फॉर मैटरनल-फीटल मेडिसिन (SMFM) के अनुसार प्लेसेंटा का यह हिस्सा, जिसे फीटल फ्रैक्शन (fetal fraction) कहते हैं, अपने सबसे ऊंचे स्तर पर, 10 से 21 हफ्ते के बीच, आमतौर पर फ्री DNA का 10% से 20% होता है। लैब यह जांचती है कि क्रोमोसोम 21, 18 या 13 से उम्मीद से ज्यादा मटीरियल तो नहीं आ रहा।
SMFM के अनुसार यह टेस्ट प्रेग्नेंसी के 9 से 10 हफ्ते से करवाया जा सकता है, और ACOG के अनुसार नतीजे आने में लगभग एक हफ्ता लगता है। नवंबर 2025 में ACOG ने SMFM की नई गाइडेंस का समर्थन किया, और उसकी जनवरी 2026 की प्रैक्टिस एडवाइजरी कहती है कि यह उसके पुराने प्रैक्टिस बुलेटिन की जगह लेती है। इसमें सलाह दी गई है कि ट्राइसॉमी 21, 18 और 13 की स्क्रीनिंग सभी गर्भवती महिलाओं के लिए नियमित रूप से उपलब्ध कराई जाए, और सेल-फ्री DNA को इनके लिए सबसे संवेदनशील (sensitive) और सबसे विशिष्ट (specific) स्क्रीनिंग टेस्ट बताया गया है। यह पहला टेस्ट भी हो सकता है, या डबल मार्कर या क्वाड्रपल टेस्ट में हाई-चांस नतीजा आने के बाद का अगला कदम भी।
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यह क्या पकड़ता है, और क्या छोड़ देता है
NIPT डाउन सिंड्रोम (ट्राइसॉमी 21), एडवर्ड्स सिंड्रोम (ट्राइसॉमी 18) और पटाऊ सिंड्रोम (ट्राइसॉमी 13) की स्क्रीनिंग करता है, और कुछ पैनल ऐसी स्थितियां भी जोड़ते हैं जिनमें एक सेक्स क्रोमोसोम ज्यादा या कम होता है, जैसे टर्नर सिंड्रोम (Turner syndrome, 45,X)। SMFM के अनुसार ट्राइसॉमी 21 के लिए इसकी डिटेक्शन रेट लगभग 99% है, जबकि पहली तिमाही की कंबाइंड स्क्रीनिंग में यह 82% से 97% और क्वाड्रपल टेस्ट में 81% है।
यह हर चीज का टेस्ट नहीं है। SMFM कहता है कि सेल-फ्री DNA सभी संभावित जेनेटिक स्थितियों की स्क्रीनिंग नहीं करता और यह नहीं देखता कि बच्चे की बनावट कैसी है, इसलिए वह हर प्रेग्नेंसी में एनाटॉमी स्कैन की सलाह देता है, चाहे कोई भी स्क्रीनिंग हुई हो। इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर प्रीनेटल डायग्नोसिस (ISPD) इसमें जोड़ती है कि लो-चांस नतीजा सभी जेनेटिक स्थितियों को खारिज नहीं करता और फॉल्स नेगेटिव हो सकते हैं, और यह भी कि जिस बच्चे में स्कैन पर बनावट से जुड़ी कोई समस्या मिले, उसके लिए फिर भी डायग्नोस्टिक टेस्ट का ऑफर दिया जाना चाहिए। SMFM माइक्रोडिलीशन (microdeletions) की नियमित स्क्रीनिंग की सलाह नहीं देता।
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लो रिस्क और हाई रिस्क संभावनाएं हैं, जवाब नहीं
रिपोर्ट एक ही बात के लिए अलग-अलग शब्द इस्तेमाल करती हैं। SMFM बताता है कि हाई-चांस नतीजा positive, high risk, aneuploidy detected या aneuploidy suspected के रूप में छपा हो सकता है, और यह भाषा गलत तरीके से डायग्नोसिस होने का आभास दे सकती है। यह टेस्ट हां या ना में जवाब नहीं देता। लो-रिस्क नतीजे का मतलब है कि जिन स्थितियों की जांच हुई उनकी संभावना कम है; हाई-रिस्क नतीजे का मतलब है कि संभावना बढ़ी हुई है।
हाई-रिस्क नतीजा कितनी बार सही निकलता है, इसे पॉजिटिव प्रेडिक्टिव वैल्यू (positive predictive value) कहते हैं, और यह इस पर निर्भर करता है कि वह स्थिति कितनी आम है। ट्राइसॉमी में यह मां की उम्र के साथ बढ़ता है। SMFM की टेबल में ट्राइसॉमी 21 का हाई-रिस्क नतीजा 20 की उम्र में 48% बार सही होता है, 25 में 51%, 35 में 79% और 40 में 93% बार। ट्राइसॉमी 18 के लिए आंकड़े 20 की उम्र में 14% से 40 में 69% तक जाते हैं, और ट्राइसॉमी 13 के लिए 6% से 50% तक। 45,X के लिए यह किसी भी उम्र में 32% है। यानी 25 की उम्र में ट्राइसॉमी 13 का हाई-रिस्क नतीजा सही होने के मुकाबले कहीं ज्यादा बार गलत होता है।
दूसरे स्रोत अलग आंकड़े देते हैं। ISPD उम्र के हिसाब से बांटे बिना मिले-जुले (pooled) आंकड़े देता है: ट्राइसॉमी 21 के लिए 91.78%, ट्राइसॉमी 18 के लिए 65.77% और ट्राइसॉमी 13 के लिए 37.23%। फॉल्स पॉजिटिव के कारण पता हैं: ISPD कहता है कि सिर्फ प्लेसेंटा तक सीमित असामान्य कोशिकाएं 1% से 2% प्रेग्नेंसी में होती हैं, और SMFM ये कारण गिनाता है: वैनिशिंग ट्विन (vanished twin), फाइब्रॉइड, पहले हुआ कोई ट्रांसप्लांट, हाल में चढ़ाया गया खून, और बहुत कम मामलों में मां में कैंसर।
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हाई-रिस्क नतीजे के बाद CVS या एम्नियोसेंटेसिस जरूरी है
SMFM कहता है कि पॉजिटिव नतीजे के बाद जेनेटिक काउंसलिंग और एक विस्तृत एनाटॉमी स्कैन होना चाहिए, और कोरियोनिक विलस सैंपलिंग (CVS) या एम्नियोसेंटेसिस (amniocentesis) से डायग्नोस्टिक टेस्ट की सलाह दी जानी चाहिए। ये टेस्ट मां के खून में मौजूद टुकड़ों की जगह प्लेसेंटा की कोशिकाओं या बच्चे के आसपास के पानी की जांच करते हैं, इसलिए ये बता सकते हैं कि बच्चे को सच में वह स्थिति है या नहीं। SMFM सिर्फ NIPT के आधार पर प्रेग्नेंसी के बारे में फैसले लेने की सलाह नहीं देता, और ISPD पुरजोर सलाह देता है कि प्रेग्नेंसी खत्म करने के बारे में कोई भी सोचे, उससे पहले डायग्नोस्टिक टेस्ट हो।
यह सिर्फ औपचारिकता नहीं है। SMFM 2014 की 30,000 से ज्यादा महिलाओं की एक स्टडी का हवाला देता है, जिसमें पॉजिटिव नतीजे वाली लगभग 6% महिलाओं ने पुष्टि के बिना ही अबॉर्शन करवा लिया, और बताता है कि दवाओं और मेडिकल उपकरणों की नियामक संस्था FDA ने अप्रैल 2022 में आम लोगों को फॉल्स पॉजिटिव के बारे में चेतावनी दी थी। आगे कौन-सा टेस्ट हो, यह नतीजे और स्कैन पर निर्भर करता है: ट्राइसॉमी 13 या 45,X में, अगर शुरुआती स्कैन सामान्य हो, तो SMFM की टेबल एम्नियोसेंटेसिस का सुझाव देती है, क्योंकि प्लेसेंटल मोजेसिज्म (placental mosaicism) CVS को गुमराह कर सकता है। हर मरीज आगे की जांच न करवाने का फैसला भी ले सकती है।
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फीटल फ्रैक्शन और 'कोई नतीजा नहीं' वाली रिपोर्ट
कभी-कभी लैब कोई जवाब नहीं दे पाती, और रिपोर्ट पर no call, no result, test failure या low fetal fraction लिखा होता है। SMFM के अनुसार ऐसे नतीजे 0.03% से 11.1% टेस्ट में बताए गए हैं, और एक बड़ी रिव्यू ने इसका अनुमान 0.85% लगाया है। ज्यादातर लैब को कम से कम 2% से 4% फीटल फ्रैक्शन चाहिए। प्रेग्नेंसी आगे बढ़ने के साथ फीटल फ्रैक्शन बढ़ता है, और SMFM बताता है कि किन चीजों से 'कोई नतीजा नहीं' वाली रिपोर्ट की संभावना बढ़ती है: बहुत जल्दी टेस्ट करना, शरीर का ज्यादा वजन, IVF या डोनर एग, जुड़वां बच्चे, कुछ बीमारियां जैसे ल्यूपस (lupus), और लो-मॉलिक्यूलर-वेट हेपरिन (low-molecular-weight heparin) नाम की खून पतला करने वाली दवा।
'कोई नतीजा नहीं' वाली रिपोर्ट सिर्फ लैब की दिक्कत नहीं है। SMFM कहता है कि इसका संबंध क्रोमोसोम से जुड़ी किसी स्थिति की ज्यादा संभावना से है: 2023 की एक स्टडी में पहली कोशिश नाकाम होने के बाद ट्राइसॉमी 21, 18 या 13 का रिस्क लगभग 130 गुना ज्यादा था, और लो फीटल फ्रैक्शन ट्राइसॉमी 13 और 18 में ज्यादा आम है। इसलिए वह जेनेटिक काउंसलिंग, एक विस्तृत स्कैन और डायग्नोस्टिक टेस्ट के ऑफर की सलाह देता है। दोबारा NIPT करने पर 75% से 80% मामलों में नतीजा मिल जाता है, पर कुछ लोग समय गंवाना पसंद नहीं करते।
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NIPT लिंग जानने का टेस्ट नहीं है, और इसे इस तरह इस्तेमाल करना गैरकानूनी है
लिंग का पता लगाना गैरकानूनी है। प्री-कंसेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (PCPNDT) Act प्रीनेटल डायग्नोस्टिक टेस्ट की परिभाषा में गर्भवती महिला के खून का ऐसा कोई भी टेस्ट शामिल करता है जो क्रोमोसोम की गड़बड़ियों का पता लगाने के लिए किया जाए, और इसमें NIPT आता है। धारा 6 कहती है कि कोई भी व्यक्ति भ्रूण का लिंग पता करने के मकसद से अल्ट्रासाउंड समेत कोई भी प्रीनेटल डायग्नोस्टिक तकनीक न तो खुद करेगा, न करवाएगा। धारा 5(2) कहती है कि कोई भी, टेस्ट करने वाला व्यक्ति भी, गर्भवती महिला को, उसके रिश्तेदारों को या किसी और को लिंग नहीं बता सकता, न शब्दों से, न इशारों से, न किसी और तरीके से।
सजा असली है। Act तोड़ने वाले डॉक्टर, लैब या क्लिनिक को पहले अपराध पर 3 साल तक की जेल और 10,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। लिंग चयन के लिए मदद मांगने वाले किसी भी व्यक्ति को पहले अपराध पर 3 साल तक की जेल और 50,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है, हालांकि यह धारा उस महिला पर लागू नहीं होती जिसे इसके लिए मजबूर किया गया हो। SMFM भी गैर-मेडिकल कारणों से लिंग जानने के लिए सेल-फ्री DNA के इस्तेमाल के खिलाफ सलाह देता है। अगर सेक्स क्रोमोसोम पैनल ऑफर किया जाए, तो उसका मकसद कोई ज्यादा या गायब सेक्स क्रोमोसोम ढूंढना होता है, और कानून किसी को भी उससे आपको लिंग बताने से मना करता है।
कब क्या करें
सामान्य — डॉक्टर को दिखाएं
हाई-रिस्क या 'कोई नतीजा नहीं' वाली NIPT रिपोर्ट: जल्द ही जेनेटिक काउंसलिंग और विस्तृत स्कैन के लिए कहें, और CVS या एम्नियोसेंटेसिस पर बात करें। सिर्फ NIPT नतीजे के आधार पर प्रेग्नेंसी के बारे में कोई भी फैसला न लें।
लो-रिस्क नतीजा: प्रेग्नेंसी की नियमित देखभाल जारी रखें, एनाटॉमी स्कैन समेत, क्योंकि NIPT यह नहीं देखता कि बच्चे की बनावट कैसी है और हर जेनेटिक स्थिति को खारिज नहीं करता।
स्रोत
- SMFM Consult Series #74: Cell-free DNA screening for aneuploidies, updated guidance (2025)obgyn.onlinelibrary.wiley.com
- Screening for Fetal Chromosomal Abnormalities, Practice Advisory (January 2026) — ACOGacog.org
- Position statement on non-invasive prenatal testing in singleton pregnancies (2023) — ISPDobgyn.onlinelibrary.wiley.com
- Prenatal Genetic Screening Tests — ACOGacog.org
- Screening for Down's, Edwards' and Patau's syndrome — NHSnhs.uk
- PCPNDT Act 1994, full text as amendedindiacode.nic.in
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